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विदेश मे सिंगापुर मै नौकरी छोड़ दिनेश जोशी ने खोला अपने गांव मे बेहतरीन रेस्टोरेंट

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♦हारेगा ना हिम्मत तो मुरझाई किस्मत भी खिल जायेगी,कोशिश करेगा हरदम तो चट्टानें भी हिल जायेगी:डॉ सुनील थपलियाल

टिहरी गढ़वाल।पलायन के दंश ने भले ही उत्तराखंड राज्य के गांवों को धीरे धीरे उजाड़कर रख दिया हो ,और राज्य सरकार के पलायन रोकने के जितने भी प्रयास हों वे भी असफल से हो रहे हैं,परन्तु फिर भी राज्य के कुछ युवा आज भी ऐसे हैं जो देश-विदेश मे सेवा के पैकेजों को ठुकराकर पहाड़ में स्वरोजगार की अलख जगा रहे हैं। ये सभी युवा या तो किसी उच्च पदों पर आसीन रहे चुके हैं या फिर विदेशों में अपनी बेहतरीन सेवा के लालच को छोड़कर अपना स्वरोजगार के लिए गांव या गांवों के बाजारों में कार्य करने के लिए प्रेरित हो चुके हैं ,विदेशों में नौकरी करने से अच्छा इनकी इस मुकाम को गांव की याद और अपनी जन्मभूमि के लिए कुछ बड़ा करने की चाहत ने बहुत छोटा कर दिया।

अब तो इन सबकी बस एक ही मंजिल है बस किसी तरह स्वरोजगार को बढ़ावा देकर और अपने उत्तराखंड की सुनहरी आबोहवा में भरण पोषण कर सके एवं क्षेत्र के अन्य युवाओं को रोजगार से जोड़कर तथा पलायन कर चुके लोगों के आदर्श बनकर उन्हें अपने उजड़े हुए बंद घरों में उजाला करने को मजबूर कर सके।

आज हम आपको एक ऐसे ही होनहार युवा से रूबरू करा रहे हैं जिन्होंने एक बार फिर अपने सपनों को साकार कर दिखाया है। जी हां.. हम बात कर रहे हैं मूल रूप से टिहरी गढ़वाल प्रताप नगर ब्लॉक के सुजड गांव निवासी दिनेश जोशी की। जिन्होंने बिना किसी सरकारी सहायता एवं प्रोत्साहन के अपने गांव के छोटे से बाजार लंबगांव मे अपने छोटे से रेस्टोरेंट खोलकर ये साबित किया कि केवल विदेशों मे नौकरी करके ही बेहतरीन जीवन नहीं चल सकता बल्कि अपने देश अपनी माटी मे भी यदि मन मे लग्न उत्साह और संकल्प सिद्ध की भावना हो तो हम बेहतरीन जीवन जी सकते है।

इसी सोच को रखते हुए दिनेश जोशी 10 से 12 साल तक विदेश मे कई देशों में अपनी सेवाएं देकर सिंगापुर से कोरोना काल के बाद अपने स्वदेश लोटे और निर्णय लिया कि अपनी माटी मै ही जीवन का बेहतरीन अध्याय शुरू करेंगे यही सोचकर इन्होंने अपना रेस्टोरेंट जोशी भोजनालय के रूप में शुरू किया जो आज बेहतरीन स्थिति में है जहां अपनी अच्छी आजीविका को दिनेश जोशी चला रहे हैं वहीं 4 से 5 लोगों को रोजगार देकर इस स्वरोजगार का लाभ दे रहे हैं ।

दिनेश जोशी का कहना है कि यदि हमारा संकल्प और लग्न मेहनत बेहतरीन है तो हम अपनी मातृ भूमि में ही बहुत अच्छा जीवन जी सकते हैं और इस मिट्टी में सोना उगाकर इसका ऋण भी अदा कर सकते हैं ,इनका मानना है कि देश हो या विदेश बिना परिश्रम के जीवन में कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता सकारात्मक प्रयास जीवन की अद्भुत प्रेरणा होती है।आज दिनेश जोशी अपने स्वरोजगार से बेहद खुश हैं इनका परिवार गांव और देहरादून दोनो जगह रहता है।

इनकी सहधर्मणी श्रीमती ममता जोशी उत्तराखंड की अच्छी साहित्यकार और लेखिका के रूप मे समय समय पर सेवाएं साहित्य समाज को से रही है। दिनेश जोशी जी का कहना है कि उत्तराखंड के गांवों का पलायन जिस तरह से बढ़ रहा है ऐसे समय मे मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य मै अपने गांव में आज रह रहा हूं।

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